मूर्ख को मूर्ख न कहो सात हाथ के बाँस की फटही लाठी में लाल झंडा लटकाए, लाल-लाल आँखों से अंगारे उगलते सोढ़नदासजी अपनी गली से बाहर निकलकर मुख्य सड़क पर आकर, जोर-जोर से आम जनता का आहवान करने लगे— “ आ जाओ मेरे मूरख-महामूरख साथियों ! एक जुट होकर खड़े हो जाओ हमारे साथ। हम सब मिलकर सीधे राजभवन चलेंगे और फिर बड़े वाले राजभवन पहुँचने का भी जुगाड़ बैठायेंगे किसी तरह। हमारा एक सूत्रीय अभियान है—मूर्खों को विशेष दर्जा दिलवाना। हो सके तो दलित के बाद महादलित वाले स्टाइल में मूर्ख के बाद महामूर्ख पद को भी संवैधानिक मान्यता दिलवाना और इसी कड़ी में लगे हाथ ये भी अनुच्छेद जुड़वा देना विशेष आध्यादेश लगाकर कि मूर्ख को मूर्ख कहने पर बिना विचार, किसी लाग-लपेट, तर्क-वितर्क, जिरह-बहस के सीधे मृत्युदण्ड सिर्फ सुना ही नहीं देना, बल्कि कोर्ट के कठघरे के बगल में ही, न्यायाधीश के सामने ही सीधे फाँसी पर लटका देने का प्रावधान होना चाहिए, ताकि मौका पाकर हाज़त से अपराधी कहीं फरार न हो जाए या सोच-विचार कर कोई महंगा वा...
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